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लघु कहानी: प्रायश्चित

महेन्द्र सिंह ‘उत्साही’


आज भी कमल आवारा बच्चों के साथ खेलने चला गया है।’ शाम को घर जाते ही श्रीमतीजी ने शिकायत की। मेरे समझाने पर भी वह नहीं माना,
उसे सबक सिखा कर ही रहूँगा, मैंने निश्चय कर लिया। पास में पड़ा डंडा उठाया और पलंग पर बैठ गया।
करीब दो–घंटे के बाद कमल आया। घर में प्रवेश करते ही उसने पहले मेरे चेहरे को ओर फिर हाथ में डंडे को देखा। वह भयभीत हो गया। दो–पल पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रहा।
उसकी झलक पड़ते ही मैं लाल–पीला हो गया। कदम धीरे–धीरे उसकी ओर बढ़ने लगे । ‘कहाँ गया था?– मैंने पूछा।
उसकी जबान लड़खड़ा कर रह गई। वह कुछ नहीं बोला। सहसा मेरे खून की गति तेज हो गई। डंडा उस पर बरसाने लगा। वह जोर–जोर से चिल्लाने लगा। मेरे गुस्से को देखकर श्रीमतीजी भी पास तक नहीं आई। जब उसे पीटते–पीटते मैं थक गया तो पलंग पर जाकर पड़ गया। नींद आ गई। सबेरे पांच –बजे किसी ने मेरे चेहरे पर से चादर हटाईं मैं अर्धनिद्रा में सो रहा था। फिर पानी के छींटे चेहरे पर बरसने लगे। मेरी आंख खुल गई। सामने कमल खड़ा था। उसके एक हाथ में पानी का लोटा और दूसरे में चाय का गिलास था, हमेशा की भाँति।
–उठो, डैडी! कितने बज गए! आज कहानी नहीं लिखोगे क्या? कहते हुए उसने लोटा आगे बढ़ाया। मैं उसे अजनबी की तरह देख रहा था।
–रात को कहीं ज्यादा चोट तो नहीं लगी तुझे? मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा। उसने अपना सिर नकार में हिलाया। रात को इतना पिटने पर भी वह उतना ही सहज वह स्नेहिल हो सकता है, यह मुझे विस्मित कर गया ।
फिर मेरी ममता फूट पड़ीं ।आँखें भर आई। अगले ही क्षण मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

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