एक वृद्ध संन्यासी नदी में स्नान करने के लिए जैसे ही उतरे, उनका पैर फिसल गया और वे नदी की तेज धारा में बहने लगे। पहाड़ी नदी होने के कारण नदी का बहाव बहुत तेज था और थोड़ा सा आगे जाकर नदी एक झरने के रूप में बहुत ऊँचाई से एक गहरी घाटी में गिरती थी। लोगों ने साधु को झरने से नीचे की ओर तेजी से गिरते देख अंदाज लगा लिया कि अब इनका बचना असंभव है। यह क्या, लोग नीचे घाटी में पहुंचे तो देखा कि साधु धीरे-धीरे पानी से बाहर आ रहे हैं। बाहर आने पर लोगों ने कहा कि आप इतनी तेज धार में बहने और इतनी अधिक ऊंचाई से गिरने पर भी कैसे सकुशल हैं? आप अवश्य ही चमत्कारी सिद्ध पुरुष हैं। साधु ने कहा, चमत्कार बस इतना ही है कि मैं नदी के तेज बहाव और प्रपात को अपने अनुकूल नहीं कर सकता था तो मैंने स्वयं को उसके अनुकूल बना लिया। मैंने किसी प्रकार का प्रयास नहीं किया अन्यथा मेरी ऊर्जा का क्षय होने के साथ-साथ चोट भी लगती और संभव है, मैं बचता भी नहीं। मैंने स्वयं को बहाव के हवाले कर दिया और नीचे गिरने के बाद जब बहाव मंद हो गया तो प्रयास करके आसानी से किनारे आ लगा। यही बात जीवन के संबंध में भी लागू होती है। समर्पण के साथ प्रयास करते रहने से जीवनरूपी नौका को आसानी से पार लगाया जा सकता है। जिस प्रकार नदी के तेज बहाव और झरने के तेजी से गिरने की गति को हम नियंत्रित नहीं कर सकते, उसी प्रकार समाज के प्रवाह को बदलना भी कठिन है। इस संसार में सुखपूर्वक रहना है, अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को परिवर्तित करना अनिवार्य है और इसके लिए नम्रतारूपी अस्त्र अत्यंत कारगर है।

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