इश्क में हम तुम्हे क्या बताये
किस कदर चोट खाए हुए हैं
मौत ने हमको मारा है और हम
जिंदगी के सताए हुए हैं
उसने शादी का जोड़ा पहन कर
सिर्फ़ चूमा था मेरे कफ़न को
बस उसी दिन से जन्नत की हूरें
मुझको दूल्हा बनाये हुए हैं
सुर्ख आँखों में काजल लगा है
रुख पे घज़ा सजाये हुये हैं
ऐसे आए हैं मय्यत पे मेरी
जैसे शादी में आए हुये हैं
बिखरी जुल्फें परेशान चेहरा
अश्क आँखों में आए हुये हैं
ए अजल ठहर जा चंद लम्हे
वोह अयादत को आए हुये हैं
उनकी तारीफ़ क्या पूछते हो
उम्र सारी गुनाहों में गुजरी
ऐसे मासोमियत से हैं बैठे
जैसे गंगा नहाए हुये हैं
जिंदगी में न रास आई राहत
चैन से अब सोने दो कफ़न में
ए फरिश्तो न छेडो न छेडो
हम जहाँ के सताए हुये हैं
खोयी खोयी सी बेचैन आँखे
बेक़रारी है चेहरे पे छाई
छोड़ दो देना झूटी तसल्ली
इश्क की चोट खाए हुये हैं
तुम्हारा इश्क तुम्हारी वफ़ा ही काफ़ी है
तमाम उम्र येही आसरा ही काफ़ी है ...
जहाँ कहीं भी मिलो मिल के मुस्कुरा देना
खुशी के वास्ते यह सिलसिला ही काफी है ..
मुझे बहार के मौसम से नही कुछ लेना
तुम्हारे प्यार की रंगीन फिजा ही काफ़ी है ..
यह लोग कौन सी मंजिल की बात करते हैं?
मुसाफिरों के लिए तू रास्ता ही काफ़ी है.
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