चिठ्ठी है किसी दुखी मन की ( कुंवर बेचैन )
बर्तन की यह उठका पटकी
यह बात बात पर झल्लाना
चिठ्ठी है किसी दुखी मन की
यह थकी देह पर कर्मभार
इसको खांसी उसको बुखार
जितना वेतन उतना उधार
नन्हे मुन्नों को गुस्से में
हर बार मार कर पछताना
चिठ्ठी है किसी दुखी मन की
इतने धंधे यह छीणकाय
ढोती ही रहती विवश हाय
खुद ही उलझन खुद ही उपाय
आने पर किसी अतिथि जन के
दुःख में भी सहसा हंस जाना
चिठ्ठी है किसी दुखी मन की
कविता संग्रह:
- चाँद के लिये एक झिंगोला
- पैसे की शान
- प्रणय-मोक्ष
- फूलों को हँसते देखा है
- हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी
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