और सिंहासन बत्तीसी की आखिरी पुतली की कहानी... और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य वृद्ध हो गए थे तथा अपने योगबल से उन्होंने यह भी जान लिया कि उनका अन्त अब काफी निकट है। और पढ़ें...
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अपनी मृत्यु को आसन्न समझकर उन्होंने वन में एक कुटिया बनवा ली और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर रात में घूमा करते थे। और पढ़ें...
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एक बार राजा विक्रमादित्य ने सपना देखा कि एक स्वर्ण महल है जिसमें रत्न, माणिक इत्यादि जड़े हैं। और पढ़ें...
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विक्रमादित्य के शस्र ज्ञान और शास्र ज्ञान की कोई सीमा नहीं थी। और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य त्याग, दानवीरता, दया, वीरता इत्यादि अनेक श्रेष्ठ गुणों के धनी थे। और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा के सुख दुख का पता लगाने के लिए कभी-कभी वेश बदलकर घूमा करते थे तथा खुद सारी समस्या का पता लगाकर निदान करते थे। और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य का सारा समय ही अपनी प्रजा के दुखों का निवारण करने में बीतता था। और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य अद्भुत गुणग्राही थे। वे सच्चे कलाकारों का बहुत अधिक सम्मान करते थे और पढ़ें...
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एक बार विक्रमादित्य एक यज्ञ करने की तैयारी कर रहे थे। वे उस यज्ञ में चन्द्र देव को आमन्त्रित करना चाहते थे। और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य सच्चे ज्ञान के बहुत बड़े पारखी थे तथा ज्ञानियों की बहुत कद्र करते थे। और पढ़ें...
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कभी-कभी उन प्रश्नों को लेकर भी उपस्थित होते थे जिनका कोई समाधान उन्हें नहीं सूझता था। और पढ़ें...
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राजा विक्रमादित्य की गुणग्राहिता का कोई जवाब नहीं था और पढ़ें...
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